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कोतमा में 4 मंजिला इमारत ढही, दो की मौत; मलबे में फंसे लोगों को निकालने में जुटी NDRF

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मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के कोतमा कस्बे में शनिवार शाम एक चार मंजिला इमारत गिरने से हड़कंप मच गया। हादसे में दो लोगों की मौत हो गई, जबकि कई लोग मलबे में दब गए। NDRF-SDRF और जिला प्रशासन की टीमें रातभर रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी रहीं।

मधमध्य प्रदेश आलम की खबर:अनूपपुर/भोपाल: मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले के कोतमा कस्बे में शनिवार शाम हुए एक दर्दनाक हादसे ने पूरे इलाके को दहला दिया। बस स्टैंड के पास स्थित एक चार मंजिला इमारत अचानक भरभराकर गिर गई, जिससे आसपास अफरा-तफरी मच गई और कुछ ही पलों में पूरा इलाका धूल और मलबे के गुबार से ढक गया। इस हादसे में अब तक दो लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि कई लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया है। रातभर चले राहत और बचाव अभियान के बाद रविवार सुबह भी रेस्क्यू ऑपरेशन जारी रहा, क्योंकि आशंका जताई जा रही है कि मलबे के नीचे अभी भी कुछ लोग फंसे हो सकते हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, यह घटना शनिवार शाम करीब साढ़े पांच बजे हुई। अचानक तेज धमाके जैसी आवाज सुनाई दी और देखते ही देखते बहुमंजिला इमारत नीचे आ गई। आसपास मौजूद लोग कुछ समझ पाते, उससे पहले धूल का घना गुबार पूरे क्षेत्र में फैल गया। हादसे के वक्त बस स्टैंड के आसपास सामान्य चहल-पहल थी, यात्री मौजूद थे और पास ही एक भूखंड पर निर्माण कार्य भी चल रहा था। यही वजह रही कि इमारत गिरते ही मौके पर अफरा-तफरी और चीख-पुकार का माहौल बन गया।

हादसे के तुरंत बाद स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर राहत कार्य शुरू किया और मलबे में दबे लोगों को निकालने की कोशिश की। बाद में पुलिस, प्रशासन और बचाव दल मौके पर पहुंचे और बड़े स्तर पर ऑपरेशन शुरू किया गया। शुरुआती जानकारी के अनुसार, अब तक पांच लोगों को मलबे से बाहर निकाला गया है, जिनमें से कुछ को गंभीर हालत में अस्पताल भेजा गया। तीन लोगों का इलाज जारी बताया जा रहा है। बचाव टीमों का फोकस इस बात पर है कि कहीं मलबे के अंदर और लोग फंसे न रह गए हों।

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जिला प्रशासन, पुलिस, NDRF और SDRF की संयुक्त टीमों ने मौके पर पहुंचकर पूरे इलाके को घेर लिया और व्यवस्थित तरीके से रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। भारी मलबे को हटाने के लिए मशीनों की मदद ली जा रही है, जबकि संवेदनशील हिस्सों में हाथों और छोटे उपकरणों से भी खोजबीन की जा रही है ताकि किसी दबे हुए व्यक्ति को नुकसान न पहुंचे। रातभर सर्चलाइट और मशीनों की मदद से अभियान चलाया गया और रविवार सुबह भी टीमें लगातार राहत कार्य में जुटी रहीं।

घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। बस स्टैंड के आसपास मौजूद दुकानदारों और स्थानीय लोगों ने बताया कि इमारत गिरते ही लोग जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे। कई लोगों ने पहले इसे विस्फोट समझा, क्योंकि गिरते समय बहुत तेज आवाज हुई थी। चूंकि हादसा भीड़भाड़ वाले इलाके के पास हुआ, इसलिए लोगों में दहशत और चिंता दोनों बढ़ गईं। स्थानीय प्रशासन ने एहतियात के तौर पर आसपास की आवाजाही सीमित की और इलाके को सुरक्षा घेरे में ले लिया, ताकि बचाव अभियान में कोई बाधा न आए।

इस हादसे पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने गहरा दुख जताया है। उन्होंने इसे अत्यंत दुखद घटना बताते हुए अधिकारियों को तुरंत राहत, बचाव और घायलों के समुचित इलाज के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रशासन पूरी गंभीरता के साथ स्थिति पर नजर रखे और यह सुनिश्चित करे कि मलबे में फंसे हर व्यक्ति तक जल्द से जल्द मदद पहुंच सके। सरकार की ओर से भी लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन की मॉनिटरिंग की जा रही है।

प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, हादसे में ढही यह इमारत करीब दस साल पुरानी बताई जा रही है। प्रारंभिक स्तर पर जो बातें सामने आई हैं, उनमें इमारत के आसपास चल रहा निर्माण कार्य भी संदेह के घेरे में है। आशंका जताई जा रही है कि पास में चल रहे निर्माण या खुदाई कार्य का असर इमारत की नींव या संरचनात्मक स्थिरता पर पड़ा हो सकता है। हालांकि प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि हादसे के सही कारणों का पता विस्तृत जांच के बाद ही चल पाएगा।

यही बिंदु अब इस पूरी घटना की जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। यदि आसपास का निर्माण कार्य वास्तव में हादसे की वजह बना है, तो यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही का मामला भी हो सकता है। ऐसे मामलों में यह देखा जाता है कि क्या निर्माण कार्य के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था, क्या इंजीनियरिंग स्तर पर जोखिम का आकलन किया गया था, और क्या आसपास की इमारतों की मजबूती का परीक्षण किया गया था। अगर इन मानकों की अनदेखी हुई है, तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है।

स्थानीय प्रशासन अब सिर्फ राहत कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र की अन्य इमारतों की सुरक्षा पर भी नजर डाल रहा है। हादसे के बाद यह सवाल तेज हो गया है कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में बनी पुरानी बहुमंजिला इमारतों की नियमित जांच क्यों नहीं होती। खासकर उन स्थानों पर जहां आसपास निर्माण या खुदाई का काम चल रहा हो, वहां अतिरिक्त निगरानी और तकनीकी मूल्यांकन की जरूरत होती है। कोतमा की यह घटना इसी बड़ी लापरवाही की ओर संकेत करती दिखाई दे रही है।

ऐसे हादसे अक्सर यह याद दिलाते हैं कि शहरी और कस्बाई इलाकों में तेजी से हो रहे निर्माण के बीच सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है। इमारतें सिर्फ ईंट, सीमेंट और लोहे की संरचना नहीं होतीं, बल्कि उनके भीतर कई परिवारों, कारोबारों और रोजमर्रा की जिंदगी का भरोसा जुड़ा होता है। जब कोई इमारत अचानक ढहती है, तो उसके नीचे सिर्फ मलबा नहीं दबता, बल्कि कई घरों की उम्मीदें, मेहनत और सुरक्षा की भावना भी चकनाचूर हो जाती है।

इस हादसे ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि नगर निकायों और स्थानीय प्रशासन को भवन निर्माण, पुरानी इमारतों की निगरानी और अवैध या जोखिम भरे निर्माण कार्यों पर कितनी गंभीरता से काम करना चाहिए। अगर समय रहते ऐसी इमारतों की तकनीकी जांच होती, तो संभव है कि इस तरह की त्रासदी को टाला जा सकता था। अब जांच एजेंसियों और प्रशासन पर यह जिम्मेदारी है कि वे सिर्फ कारणों का पता ही न लगाएं, बल्कि भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए ठोस कदम भी उठाएं।

फिलहाल कोतमा की पूरी निगाहें रेस्क्यू ऑपरेशन पर टिकी हैं। हर बीतते घंटे के साथ मलबे के नीचे फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने की उम्मीद और चिंता दोनों बनी हुई हैं। राहत दलों की कोशिश है कि किसी भी संभावित जीवित व्यक्ति तक जल्द से जल्द पहुंचा जाए। वहीं प्रशासन की प्राथमिकता घायलों का इलाज, मृतकों की पहचान और प्रभावित परिवारों को हर संभव सहायता उपलब्ध कराना है।

कुल मिलाकर, कोतमा में चार मंजिला इमारत गिरने की यह घटना सिर्फ एक स्थानीय हादसा नहीं, बल्कि सुरक्षा, निर्माण मानकों और प्रशासनिक सतर्कता पर बड़ा सवाल बनकर सामने आई है। दो लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने के बाद यह हादसा पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी की तरह है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि रेस्क्यू ऑपरेशन कब तक पूरा होता है, कितने लोग सुरक्षित बाहर निकलते हैं और आखिर इस इमारत के गिरने के पीछे असली वजह क्या थी।

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